Monday, August 17, 2009

अशार

मैं तो एक खवाब हूँ खो न जाऊं कही
इन निगाहों में मुझको बसा लीजिये
याद तनहाई में जब सताए कोई
बस अलीम की ग़ज़ल गुनगुना लीजिये

अशार
सितम मत पूछिए कैसे मेरा दिलदार करता है
कभी इनकार करता है कभी इज़हार करता है
जुबां से तो कभी इज़हार उल्फत वो नही करता
निगाहों से यह लगता है वोह मुझे प्यार करता है

11 comments:

  1. it was so romantic thanks for posting

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  2. शानदार अशआर कहे हैं आपने।
    ( Treasurer-S. T. )

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  3. वाह क्या बात है! मुझे आखरी लाइन सबसे पसंद आया ..निगाहों से लगता है वो मुझे प्यार करता है ...बिल्कुल सही क्यूंकि निगाहों से हर बात ज़ाहिर की जा सकती है और जुबान से कहने की ज़रूरत नहीं पड़ती !

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  4. बेहद खूबसूरत रचना है जी

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  5. khab banke ankho me basne ka khayal achha hai....

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  6. kam se kam nigaho se hi sahi..
    wo apne ishq ka izhaar to karta hai .. :)

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  7. अजीम जी अच्छा लिखते हैं ....आपकी पिछली पोस्ट भी देखी ज़ज्बात अच्छे हैं ...यूँ ही लिखते रहें .....!!

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  8. आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया! वक्त मिलने से मेरा ये ब्लॉग भी देखिएगा -

    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com

    आपके नए पोस्ट का इंतज़ार है!

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ap sabhi ka sawagat hai aapke viksit comments ke sath