Monday, December 14, 2009

ग़ज़ल

पाकीज़ा मोहब्बत को गुनेहगार न करना,
तुम प्यार तो करना मगर इज़हार न करना।

कुर्बान का जज़्बात तुम्हे विरसे में मिला है
वोह जान अगर मांगे तो इनकार न करना।

सूरत से बड़ी चीज़ है महबूब की कीरत,
आवारा हवाओं से कभी प्यार न करना।

2 comments:

  1. सुन्दर गज़ल है. चंद शे’र और कहते तो मज़ा आ जाता.

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ap sabhi ka sawagat hai aapke viksit comments ke sath