Saturday, March 5, 2011

ग़ज़ल


तेरे रख दू गुलाब बराबर
कुछ तो हो हिसाब बराबर

मैं बरसो से ही चाहता हूँ
आप ही को जनाब बराबर


जब से तुमको देखा है
तब से हूँ बेताब बराबर

जैसे हो झोंका बादे सबा का
यूँ गुज़रता जाए शबाब बराबर


मुझको तेरे ख्यालों के
आ रहे हैं ख्वाब बराबर

जो लिखा तेरे ख्यालों में
वो हुई ग़ज़लें किताब बराबर


कहा पहुचा हूँ तुझ तक
अभी तक है हिसाब बराबर

अब किसे चाहोगे "अलीम"
कौन होगा महताब बराबर

No comments:

Post a Comment

ap sabhi ka sawagat hai aapke viksit comments ke sath